शब्दों के जादू को जानना आसन नही,
जिसने भी जाना है इसे उसने कभी खुद को कहा विद्वान नही,
अपनी भी कहानी की सुरुवात हुई थी इन्ही शब्दों से,
कभी शब्द था कभी मै और कभी वो,
सोते जागते,उठते बैटते,चलते फिरते हमेसा शब्दों से ही घिरा रहता था,
कुछ मेरे तो कुछ उसके शब्द थे.
जी भी रहा था उन्ही शब्दों के सहारे,
बिना कुछ सोचे समझे या विचरे,चल रह था भाग रहा था दोर रहा था ,
पुल व् बांध रहा थे ढेरो सपनों के आज के तो कुछ कल के,
फिर एक दिन एक सैलाब आया इन्ही शब्दों का और एक ही पल में बिखर गये सारे शब्द.
कुछ अनकहे शब्द अनकहे ही रह गये,
शब्दों से बना संसार पता नही कन्हा खो गया,
मैंने भी छोर दिया,भुला दिया उन शादो को शब्दों के हवाले छोर के चल परा,
बढ़ा जिनगी के रहो में बहुत सारा शब्दों को अनसुना कर के,
किन्तु क्या करू बंधू शब्द तो शब्द हैं,
अजर अमर और सर्वोपरी हैं ये शब्द,
हमेसा आस पास ही रहते हैं कभी तो हंसा देते है तो कवी रुला देते हैं,
तभी तो कहते हैं अगर शब्दों का साथ छूता तो जिन्दगी भी साथ छोर देती है,
शब्द हैं तो जिन्दगी है चाहे वो बिन कहे शब्द ही क्यूँ न हो,
- कुमार अंकित
जिसने भी जाना है इसे उसने कभी खुद को कहा विद्वान नही,
अपनी भी कहानी की सुरुवात हुई थी इन्ही शब्दों से,
कभी शब्द था कभी मै और कभी वो,
सोते जागते,उठते बैटते,चलते फिरते हमेसा शब्दों से ही घिरा रहता था,
कुछ मेरे तो कुछ उसके शब्द थे.
जी भी रहा था उन्ही शब्दों के सहारे,
बिना कुछ सोचे समझे या विचरे,चल रह था भाग रहा था दोर रहा था ,
पुल व् बांध रहा थे ढेरो सपनों के आज के तो कुछ कल के,
फिर एक दिन एक सैलाब आया इन्ही शब्दों का और एक ही पल में बिखर गये सारे शब्द.
कुछ अनकहे शब्द अनकहे ही रह गये,
शब्दों से बना संसार पता नही कन्हा खो गया,
मैंने भी छोर दिया,भुला दिया उन शादो को शब्दों के हवाले छोर के चल परा,
बढ़ा जिनगी के रहो में बहुत सारा शब्दों को अनसुना कर के,
किन्तु क्या करू बंधू शब्द तो शब्द हैं,
अजर अमर और सर्वोपरी हैं ये शब्द,
हमेसा आस पास ही रहते हैं कभी तो हंसा देते है तो कवी रुला देते हैं,
तभी तो कहते हैं अगर शब्दों का साथ छूता तो जिन्दगी भी साथ छोर देती है,
शब्द हैं तो जिन्दगी है चाहे वो बिन कहे शब्द ही क्यूँ न हो,
- कुमार अंकित








